भारत अभी भी गलत को गलत और सही को सही के रूप में ही देखता है

NewsBharati    07-Nov-2020 11:14:03 AM
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महाराष्ट्र में अर्णब गोस्वामी के साथ जो हो रहा है वह कांग्रेस की हिंसक और बर्बर सोच का ही उदाहरण है। जाहिर है इसके बचाव में कम्युनिस्ट और तथाकथित सेकुलर खेमा हमेशा की तरह मैदान में उतरेंगे ही क्योंकि कांग्रेस के भीतर की हिंसा, असहिष्णुता और बर्बरता इन्हीं की तो देन है। शिवसेना और एनसीपी भी कांग्रेस इकोसिस्टम के हिस्से हैं। इसलिए लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हत्या में ये भी कांग्रेस का ही साथ देंगे।

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रिपब्लिक टीवी के एडिटर इन चीफ अर्णब गोस्वामी की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। बॉम्बे हाई कोर्ट से अर्णब को आज राहत नहीं मिली है, जमानत अर्जी पर अगली सुनवाई कल यानी कि शुक्रवार काे होगी। ऊपर से, रायगढ़ की अलीबाग कोर्ट में पुलिस ने रिव्यू अर्जी दाखिल कर दी है। ये अर्जी अर्णब की पुलिस रिमांड हासिल करने के लिए दी गई है। बुधवार को कोर्ट ने पुलिस रिमांड की जगह गोस्वामी को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया था, इसके खिलाफ अलीबाग पुलिस ने कोर्ट में रिव्यू अर्जी दाखिल की है। कोर्ट ने इस अर्जी को स्वीकार कर लिया है जिसपर 7 नवंबर को सुनवाई होगी।
 
देश में कांग्रेस एक ऐसी राजनीतिक पार्टी है जो अपने विरोधियों से हिंसक और असभ्य तरीके से व्यवहार करने से पीछे नहीं रहती। जिन्होंने नब्बे का दशक नहीं देखा है वो अंदाज़ ही नहीं लगा सकते कि सत्ताधारी होने पर कांग्रेस कितनी हिंसक और बर्बर हो जाती है, पलक झपकते कांग्रेस बीजेपी सरकारों के खिलाफ धारा 356 का इस्तेमाल करती थी। बीजेपी को रोकने के लिए कोई ऐसा कुकर्म नहीं था जिसे कांग्रेस ने न किया हो। लेकिन बीजेपी को कुएँ में धकेलने के चक्कर में कांग्रेस स्वयं खाई में गिर गई, और ऐसी गिरी कि छोटे छोटे क्षेत्रीय दलों की पिछलग्गू पार्टी होकर रह गयी है।
 
महाराष्ट्र में अर्णब गोस्वामी के साथ जो हो रहा है वह कांग्रेस की हिंसक और बर्बर सोच का ही उदाहरण है। जाहिर है इसके बचाव में कम्युनिस्ट और तथाकथित सेकुलर खेमा हमेशा की तरह मैदान में उतरेंगे ही क्योंकि कांग्रेस के भीतर की हिंसा, असहिष्णुता और बर्बरता इन्हीं की तो देन है। शिवसेना और एनसीपी भी कांग्रेस इकोसिस्टम के हिस्से हैं। इसलिए लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हत्या में ये भी कांग्रेस का ही साथ देंगे।
 
लेकिन इस देश का लोकमानस बहुत प्रबल है। कुछ प्रतिशत सेकुलर, इस्लामिस्टों और कम्युनिस्ट कांग्रेसियों को छोड़ दें बाकी भारत अभी भी गलत को गलत और सही को सही के रूप में ही देखता है। वह लोकमानस कभी किसी के साथ अन्याय बर्दाश्त नहीं करता। इससे मतलब नहीं कि अन्याय करनेवाला कौन है और सहने वाला कौन। लोकमानस सदैव सहने वाले के साथ सहानुभूति रखता है। बीजेपी के साथ भी रखा। अब अर्णब के साथ रखेगा। बाकी कांग्रेस और शिवसेना अपनी वैचारिक चिंताओं के लिए लकड़ियां इकट्ठी कर रहे हैं, इससे अधिक उनके इस दमन, बर्बरता और पाशविकता का कोई महत्व नहीं है।