विभाजनकारी नीतियों से रहित बजट

वास्तव में बजट राष्ट्र की प्रगति व विकास का प्रमुख आधार होता है। इसे अलगाववाद या तुष्टीकरण का मोहरा नहीं बनने देना चाहिए। इस संबंध में वर्तमान सरकार साधुवाद की पात्र है जिसने ना सिर्फ देश को कोविड संकट से उबारा अपितु विपरीत परिस्थितियों में भी देशवासियों का मनोवल बनाए रखते हुए विकास की राह पकड़ी रखी।

NewsBharati    02-Feb-2022 15:46:50 PM   
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बजट का शब्द सुनते ही मन में एक ही बात आती है कि यह भविष्य के अर्थ-प्रबंधन का एक खाका होगा। आगे आने वाले समय में क्या आय-व्यय होगा तथा किस मद पर कितना व्यय करने का लक्ष्य रखा जाएगा यह सब उसमें विस्तार से वर्णित होता है। देश के समेकित विकास हेतु, विविध समुदायों के निर्बल वर्ग के विकास हेतु क्या कदम उठाए जाएं, इस हेतु भी सरकारों द्वारा घोषणाएं बजट में की जाती हैं। अर्थव्यवस्था के विविध आयामों के साथ साथ सामरिक, सामाजिक व सांस्कृतिक उत्थान हेतु भी वित्त प्रबंधन किया जाता है। अर्थात आगामी वर्ष में देश कहाँ से कहाँ तक पहुंचना है, उसका आर्थिक खाका बजट के माध्यम से सरकारें प्रतिवर्ष संसद के पटल पर रखती हैं।
 

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हम एक ऐसे देश में रहते हैं जो एक पंथ-निरपेक्ष संविधान द्वारा संचालित है। इसके अंतर्गत राज्य अपने नागरिकों के बीच जाति, मत-पंथ या सांप्रदायिक आधार पर भेद-भाव नहीं कर सकता। किन्तु दुर्भाग्य से काँग्रेस शासन काल में इन सभी संवैधानिक प्रावधानों को चुनौती देते हुए बजट को भी मुस्लिम तुष्टीकरण का हथियार बना दिया गया था। इसकी कुछ बानगी देखिए..
 
वर्ष 2008-2009 के अपने बजट भाषण में तत्कालीन वित्त मंत्री श्री पी. चिदंबरम ने अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय का बजट 500 करोड़ से दोगुना बढ़ाकर 1000 करोड़ कर दिया तथा सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर कार्यवाही करते हुए देश के 90 जिलों को अल्पसंख्यक बाहुल्य घोषित कर उनके विकास हेतु ना सिर्फ 3780 करोड़ रुपयों का प्रावधान किया अपितु उन क्षेत्रों में बैंकों की 256 शाखाएं खोलीं तथा 288 और खोलने की घोषणा की जहां ब्याज लेना व ब्याज देना दोनों ही हराम है। इसके साथ ही इस्लामिक शिक्षा मदरसों के आधुनिकीकरण के लिए 45.45 करोड़ लुटा दिए।
 
इतना ही नहीं केन्द्रीय शस्त्र बलों में अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों की भर्ती हेतु विशेष अभियान चलाए गए तथा मौलाना आजाद एजुकेशन फाउंडेशन के कोरपस में बढ़ोत्तर हेतु 60 करोड़ रुपए भी दिए गए।
 
इससे पूर्व तत्कालीन यूपीए सरकार द्वारा 29 जनवरी, 2006 को अधिसूचित अल्पसंख्यक समुदायों अर्थात् मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध, सिक्ख, पारसियों तथा जैनों से संबंधित मामलों पर बल देने के लिए केंद्र सरकार ने एक अलग अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय का गठन सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय में से किया। कहने को तो इसमें 6 समुदायों का सम्मिश्रण है किन्तु इसकी अधिकांश नीतियाँ व उनके सर्वाधिक लाभार्थी मुस्लिम समुदाय ही है। इसी मंत्रालय के अधीन बने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग तथा देश भर में खुली इसकी राज्य शाखाएं आज भी बहु-संख्यकों के लिए चुनौती बनी हुई हैं। क्योंकि इन आयोगों के बल पर कुछ समाजकंटक हिन्दू समाज को डराने धमकाने तथा उनके उत्पीड़न में लगे हैं। अनेक बार शिकायतों के बावजूद आयोग ना तो जिहादियों पर शिकंजा कसता है और ना ही पीड़ित गैर-अल्पसंख्यकों को कोई राहत ही देता है। तब उन्हें लगता है कि एक राष्ट्रीय बहुसंख्यक आयोग भी होना चाहिए।
 
16 फरवरी 2009 को सदन में प्रस्तुत अपने बजट भाषण में तत्कालीन वित्त मंत्री श्री प्रणव मुखर्जी ने तो अल्पसंख्यकों के कथित कल्याण हेतु एक 15 सूत्रीय कार्यक्रम की घोषणा ही कर दी। इसके लिए पर्याप्त वित्त प्रबंधन भी किया गया।
 
26 फरवरी 2010 को अपने बजट भाषण के पैरा 99 में श्री मुखर्जी ने अल्पसंख्यक मंत्रालय के बजट को सीधा दुगुना करते हुए उसे 1740 करोड़ से 2600 करोड़ करने की घोषणा कर दी। साथ ही उन्होंने प्राथमिकता के क्षेत्रों के लिए आवंटित कर्ज की राशि को भी अल्पसंख्यकों के खाते में डाल दिया। पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने तो यहाँ तक कह दिया था कि अल्पसंख्यकों का भारत के संसाधनों पर पहला अधिकार है। जब देश का विभाजन सांप्रदायिक आधार हो चुका तो अब उनका पहला अधिकार कैसे?
 
जहां पिछले बजट भाषणों में बार-बार अल्पसंख्यक शब्द का प्रयोग किया जाता था इस बार के बजट-2022 में “अल्पसंख्यक” शब्द ढूँढने से भी नहीं मिला। शायद इसीलिए कि वर्तमान केंद्र सरकार यह जानती है कि हमारी सभी विकास व रोजगार परक नीतियों का लाभ जब सभी को मिलने वाला है तो वे फिर चाहे अल्पसंख्यक हों या बहु-संख्यक क्या फर्क पड़ता है। वैसे भी सरकार का नारा “सबका साथ - सबका विकास – सबका विश्वास” है। अल्पसंख्यकों के लिए बजट में अलग प्रावधान कहीं ना कहीं देश में अलगाववाद को ही प्रोत्साहित करता है। जब-जब सरकारी नीतियाँ सांप्रदायिक आधार पर बनीं तब-तब देश के विभाजन की नींव रखी गई।
 
‘सर्वे भवन्तु सुखिन:..’ व ‘वसुधैव कुटुंबकम..’ के सिद्धांत को मानने वाले भारत में “अल्पसंख्यक” शब्द का कोई अर्थ नहीं है। आज समय आ गया है जब सरकारें अल्पसंख्यक आयोग, अल्पसंख्यक कार्य-मंत्रालय तथा अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की सभी नीतियों को यहाँ से विदा करें। इसके अतिरिक्त संविधान के अनुच्छेद 29 व 30 में प्रदत्त अधिकार सिर्फ अल्पसंख्यक को ही नहीं अपितु, शेष सभी नागरिकों को दे। जिससे सामाजिक विषमता व विद्वेष के इस प्रमुख कारक को भी समाप्त किया जा सके। वैसे भी सम्पूर्ण विश्व में संभवतया भारत ही है जो अपने कथित अल्पसंख्यकों को वे अधिकार देता है जो कि यहाँ के बहु-संख्यकों के पास भी नहीं हैं।
 
वास्तव में बजट राष्ट्र की प्रगति व विकास का प्रमुख आधार होता है। इसे अलगाववाद या तुष्टीकरण का मोहरा नहीं बनने देना चाहिए। इस संबंध में वर्तमान सरकार साधुवाद की पात्र है जिसने ना सिर्फ देश को कोविड संकट से उबारा अपितु विपरीत परिस्थितियों में भी देशवासियों का मनोवल बनाए रखते हुए विकास की राह पकड़ी रखी। साथ ही, अदृश्य शत्रु से लड़ते हुए देशवासियों का धैर्य, कर्मठता तथा सरकारी नीतियों में पूर्ण विश्वास भी बेहद प्रशंसनीय व वंदनीय है।
 
 

Vinod Bansal

लेखक विश्व हिन्दू परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं