हिन्दु जीवन दृष्टि- एकात्म मानव दर्शन

NewsBharati    02-Sep-2020 14:17:25 PM
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भारतीय जनमानस सत्यमेव जयते के अटल विश्वास से विश्व गुरू के सिंहासन पर भारत माता को बैठाकर प्राचीन वैभव की तरफ निरंतर बढ़ रहा है। हमारे पूर्वजों के मानव जीवन और ब्रह्मांड के बारे में सत्य समझने के प्रयास में की तपस्या से प्राप्त ज्ञान के प्रकाश में इस पुण्य भूमि में समाज और जीवन प्रणाली का विकास हुआ जिसे हिंदू संस्कृति कहते हैं।हिंदुत्व का सृष्टि के संबंध में वैश्विक दृष्टिकोण गीता के दूसरे अध्याय में नारायण द्वारा अर्जुन को दिये सनातन ज्ञान " सर्व खलु इदं ब्रह्म " से स्पष्ट होता है। इस वैज्ञानिक सत्य की अनुभूति और खोज हमारे पूर्वजों ने ही की है। सनातन सत्य " एक ही चेतना से इस विश्व ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई है " से ही हमारी यह जीवन दृष्टि विकसित हुई है।

" हिन्दु जीवन दृष्टि " को संक्षेप में परिभाषित करना हो तो यह एकात्म जीवन दृष्टि है। इसी कारण हिंदू मानस की स्वाभाविक कामना " सरबत दा भला ", "सर्वे भवंतु सुखिनः " , "भवतु मंगलम " , "विश्व का कल्याण हो " इन शब्दों में व्यक्त होती है।वसुधैव कुटुम्बकम की भावना हिन्दु जीवन दृष्टि को और अधिक परिभाषित करती है।प्रकृति को माता के रूप में अर्थात " मातृत्व " का भाव,स्वामीत्व का नहीं हिंदू जीवन दृष्टि की विशेषता है। इस से सभी में शोषण की जगह दोहन की दृष्टि विकसित होती है अर्थात माँ का स्तनपान करने का अधिकार सभी को पर माँ का रक्तपान करने का अधिकार किसी को नहीं है।जल, वायु,धरती, वनस्पति, फल-फूल आदि पर सभी का समान अधिकार है लेकिन जितना आवश्यक हो उतना ही उपयोग करना तांकि संयम, सादगी और त्याग पूर्वक उपभोग जीवन मूल्य बने।
मानव के सम्बन्ध में हिंदूत्व का वैश्विक दृष्टिकोण यही है कि मानव केवल भौतिक प्राणी नहीं अपितु ईश्वरीय अंश होने के कारण अमृत पुत्र है।चार तत्वों शरीर, मन, बुद्धि व आत्मा के समुच्य से व्यक्ति बनता है। इसी प्रकार व्यक्ति कभी भी अकेल नहीं है, वह " व्यष्टि, समष्टि,सृष्टि व परमेष्टि " इन सब के समाधान में ही सच्चा सुख प्राप्त कर सकता है।आत्मा की अमरता और पुनर्जन्म हिंदू जीवन प्रणाली का शाश्वत सत्य है।पश्चिमी जीवन प्रणाली की तरह पञ्च इँद्रियो से प्राप्त सुख हिन्दु जीवन प्रणाली का लक्ष्य नहीं है।हमारी सनातन जीवन प्रणाली में चिरंतन सुख (मोक्ष) की प्राप्ति ही मानव जीवन का लक्ष्य है। व्यक्ति के समग्र विकास के लिये चार पुरूषार्थ "धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष" ही आधार है। मनुष्य यदि प्रयास करे तो शरीर, मन, बुद्धि से परे हो कर परम तत्त्व का साक्षात्कार कर सकता है।
प. पू.डॉ हेडगेवार जी के शब्दों में "हमें नवीन कुछ नहीं करना है। हमारे पूर्वजों ने जिस प्रकार समाज और संस्कृति की सेवा की, जो ध्येय अपने सामने रखे और उनकी प्राप्ति के लिये दिन-रात प्रयत्न किये, उन्ही ध्येयों को उसी भांति हमें भी सिद्ध करना है। उनका अधूरा रहा कार्य पूरा कर राष्ट्र सेवा करनी है। "महात्मा गाँधी के शब्दों में "सत्य की निरंतर खोज का नाम ही हिन्दुत्व है। परम पूजनीय सर संघचालक मोहन भागवत जी के शब्दों में " योजनापूर्वक भगवान ने हमें हिन्दु बनाया। हिंदूत्व कि देखभाल करने के लिये। परंतु यह किसी का ठेका भी नहीं है। यह सतत, निरंतर,गतिमान सत्य की अनवरत खोज का नाम है। वह जिस परिस्थिति में रहता है उस परिस्थिति में परिस्थिति की क्षमतानुसार उसकी विवेकपूर्ण अभिव्यक्ति होतीं है। यह तो भारत वर्ष का प्राण तत्त्व है ।इसी के आधार पर अपना देश विश्व गुरू बनेगा।"
लोगों का मानना है कि आज का समय भीषण और संकटमय है किंतु मैं कहूंगा की आज जैसी अनुकूल परिस्थिति कभी नहीं आयी। यही समय है हम लोगों के लिये जी-जान से प्रयत्न करने का। ऐसा भय नहीं मानना चाहिये कि समय कठिन आ गया। प्रतिकूल परिस्थिति को परास्त कर के जो कार्य करता है, वही अंत में बाजी मारता है।और हमें डरने की क्या जरूरत है ? भगवान का वरद हस्त हमारे सिर पर है क्यूंकि हमारा कार्य ईश्वरीय कार्य है। संतों का शुभाशीष भी हमारे साथ है।
हिन्दु धर्म ज्ञान, विज्ञान, नित्यता,अनित्यता आदि समस्त भौतिक एवं अभौतिक बंधनों एवं सीमाओं से मुक्त है।यह एक जीवन शैली है जिसे धारण करने वाला विश्व बन्धुत्व की भावना से ओत-प्रोत रहता है। आधुनिक दुनिया की मानवीय मर्यादाओं की आधार भूमि हिन्दु धर्म से ही सृजित होती है।
हमें अपने राष्ट्र के विराट को जाग्रत करने का काम करना है। अपने प्राचीन के प्रति गौरव का भाव ले कर, वर्तमान का यथार्थ आंकलन कर भविष्य की महत्वाकांक्षा ले कर हम इस काम में जुट जाएं और अपनी प्राचीन समृध्द परंपरा के आधार पर ऐसे भारत का निर्माण करें जो हमारे पूर्वजों से अधिक वैभवशाली हो जिसमें जन्मा मानव अपने व्यक्तित्व का विकास करते हुए संपूर्ण मानव ही नहीं अपितु सृष्टि के साथ साक्षात्कार कर नर से नारायण बनेगा। चौराहे पर खड़े विश्व के लिये हिन्दु जीवन दर्शन का यही दिग्दर्शन है।

- सुखदेव वशिष्ठ