भारतीय शिक्षा की मूल भावना के सम्बन्ध में विष्णु पुराण में कहा गया है " असतो मा सद् -गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय " अर्थात असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमरता की ओर ले जाने वाली शिक्षा ही शिक्षा कहलाती है। भारत में प्राचीन काल से ही शिक्षा की समृद्ध शिक्षा व्यवस्था रही है। शिक्षा का अंग्रेजी प्रतिमान अंग्रेजी काल में चार्ल्स ग्रांट, विल्वर फोर्स या फिर मैकाले ही रहे।जब देश आजाद हुआ तो युगानुकूल परिवर्तन के माहौल में शिक्षा का अपना मॉडल अपनाया जा सकता था । देश आजाद होते ही 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजी के विद्यालय बंद करने से हम एकाध वर्ष में उसको बदल कर अपनी व्यवस्था (मॉडल)बना सकते थे। परंतु उस समय पर यह ऐतिहासिक भूल हो गयी।अंग्रेजी शिक्षा तंत्र के लागू होते ही इसका विकल्प खोजने की प्रक्रिया शुरू हो गई थी। उसी में से शिक्षा के अनेक वैकल्पिक मॉडल विकसित होते चले गये।
महात्मा गांधी ने जो बुनियादी शिक्षा का मॉडल खड़ा किया उसमें भारत, भारतीय समाज और उसकी आवश्यकताओं को ध्यान में रख कर उसका गठन किया।यह मॉडल रोजगार परक होने के साथ-साथ उसमें धर्म व अन्यान्य चीजें भी थी। कला-कौशल के सम्बन्ध में भी चिंता की गई थी। महाऋषि अरविंद ने पॉन्डिचेरी में एक मॉडल विकसित करने का प्रयास किया। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने शान्ति निकेतन का एक मॉडल विकसित करने का प्रयास किया।लोकमान्य तिलक ने जो स्वदेशी आंदोलन चलाया जिसमें सत्याग्रह और स्वदेशी के मुद्दे थे उन में से ही राष्ट्रीय विद्यालय की अवधारणा भी आई।भारत की शिक्षा राष्ट्रीय होनी चाहिये, इसी कल्पना के साथ राष्ट्रीय विद्यालय खड़े हुए। आर्य समाज ने गुरूकुल परंपरा के रूप में विद्यालय चलाये। स्वामी श्रद्धानंद द्वारा स्थापित गुरूकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय की स्थिति इतनी बढ़िया थी कि उस में से निकले व्यक्तित्व भारत के प्रमुख स्थानों पर शासन करते थे।आजादी से पूर्व ही उत्तर देने के लिये संघर्ष चल रहा था लेकिन शासन व्यवस्था ब्रिटिशों के हाथ में थी। इस लिये प्रयोग ही हो सकते थे ,पूर्ण परिवर्तन संभव नहीं था। आजादी के तुरंत बाद अंग्रेजी विद्यालय बंद कर दिये जाते तो शायद यह वैकल्पिक प्रतिमान चल सकते थे लेकिन दुर्भाग्यवश यह नहीं हो पाया और पुराना अंग्रेजी चक्र ही चलने के कारण हम आज भी घूम फिर के उसी व्यवस्था में से गुजरते हुए उस के परिणामों को देख रहे हैं ।
इस का विकल्प देने के लिये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रेरणा से भारतीय चिंतन के आधार पर बहुत बड़े सांगठनिक प्रयास के रूप में विद्या भारती कार्यरत है।विद्या भारती विश्व का शिक्षा के क्षेत्र में सबसे बड़ी गैर सरकारी संगठन है। पंचकोषीय शिक्षा के आधार पर चरित्र निर्माण एवं व्यक्तित्व का समग्र विकास ही शिक्षा के भारतीय प्रतिमान में प्रतिबिंबित होना चाहिये। शिक्षा देश की संस्कृति के अनुरूप, जीवन के लक्ष्यों का बोध करवाने वाली और उस के अनुरूप सामर्थ्य उत्पन्न करने वाली होनी चाहिये। शिक्षा धर्मनिष्ठ होने के साथ साथ राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय आवश्यकताओं की पूर्ति तथा चुनौतियों का सामना करने वाली होनी चाहिये।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर कार्यवाह भैयाजी जोशी के शब्दों में " शिक्षा को व्यवसाय की बजाय मिशन के रूप में लेकर चलने वाले संस्थान होना समय की मांग हैं ।" भारतीय शिक्षा के वर्तमान प्रतिमान इन सब बातों को ध्यान में रख कर ऐसी युवा पीढ़ी का निर्माण करें जो भारत को आत्मनिर्भर,सक्षम और समर्थ बनाते हुए परम वैभव के लक्ष्य को खुली आंखों से देख सके।
- सुखदेव वशिष्ठ