पिछड़ाें के नाम पर अपने भविष्य की चिंता

26 Aug 2021 18:27:42
यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज जो राजनेता अपने आप को लोकनायक जयप्रकाश नारायण और डॉ. राममनोहर लोहिया का अनुयायी बताकर राजनीति कर रहे हैं‚ वही जातीय जनगणना की मांग जोर–शोर से कर रहे हैं‚ जबकि इन महापुरुûषों का भी मानना था कि जातीयता भारत लिए अभिशाप है। लोकनायक ने संपूर्ण क्रांति की सात क्रांतियों में सामाजिक क्रांति को सबसे महत्वपूर्ण माना था। उन्होंने कहा था कि जातीयता के भाव जो लोगों के मन में बैठे हुए हैं‚ उनसे हर क्षेत्र प्रभावित होता है।
 

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जातीय जनगणना का मुद्दा इन दिनों काफी चर्चा में है। इसके निमित्त विभिन्न राजनीतिक दलों के अनेक नेताओं ने जातीय जनगणना कराने के पक्ष में आवाज भी उठाई है। बिहार और उप्र में तो यह बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है। ओ.बी.सी. के लिए जातिगत जनगणना के लिए सर्वाधिक ऊंची आवाजें राजनीतिक क्षेत्र से उठ रही हैं, पिछड़ी जातियों के नेता यह साबित करने में लगे हैं कि पिछड़ों की जातिगत जनगणना के बाद ही उनका विकास हो पाएगा। उसी के जरिए सामाजिक न्याय मिलेगा, लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है।

बिहार का ही उदाहरण गौरतलब है, क्योंकि वहां के नेता सबसे ज्यादा उछल रहे हैं कि लाभकारी योजनाओं का फायदा अंतिम व्यक्ति तक जरूर पहुंचे, लिहाजा जातिवार डाटा उपलब्ध होना चाहिए। बिहार में बीते 16 सालों से लगातार नीतीश कुमार मुख्यमंत्री हैं। उनसे पहले लालू प्रसाद यादव और उनकी पत्नी राबड़ी देवी 15 साल तक मुख्यमंत्री रहे। बिहार का बदनसीब यथार्थ यह है कि अब भी हर साल भयानक बाढ़ आती है, पुल सरीखे निर्माण-कार्य ढह जाते हैं, लोगों के घर ध्वस्त होकर बहने लगते हैं और औसत बिहारी लावारिस की जिंदगी जीने को विवश होता है। यह विनाशकारी सिलसिला कभी नहीं रुक पाया है। कमोबेश बाढ़ की व्यवस्था के लिए जातीय जनगणना की कोई जरूरत है ?

देश के लगभग हर राज्य के प्रादेशिक क्षत्रप इस समय दो काम करते दिख रहे हैं। उनका पहला काम भारतीय जनता पार्टी के मुकाबले एक मजबूत गठबंधन बनाने का प्रयास करना और इसके लिए सब भागदौड़ कर रहे हैं। दूसरा काम जाति आधारित जनगणना की मांग है, जिसे लेकर प्रादेशिक क्षत्रप बहुत मुखर हैं। इतने मुखर हैं कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने धुर विरोधी राष्ट्रीय जनता दल के नेता और बिहार विधानसभा में नेता विपक्ष तेजस्वी यादव को साथ लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने दिल्ली पहुंच गए।

यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज जो राजनेता अपने आप को लोकनायक जयप्रकाश नारायण और डॉ. राममनोहर लोहिया का अनुयायी बताकर राजनीति कर रहे हैं‚ वही जातीय जनगणना की मांग जोर–शोर से कर रहे हैं‚ जबकि इन महापुरुûषों का भी मानना था कि जातीयता भारत लिए अभिशाप है। लोकनायक ने संपूर्ण क्रांति की सात क्रांतियों में सामाजिक क्रांति को सबसे महत्वपूर्ण माना था। उन्होंने कहा था कि जातीयता के भाव जो लोगों के मन में बैठे हुए हैं‚ उनसे हर क्षेत्र प्रभावित होता है। आज उनकी आत्मा कचोट रही होगी कि उनके कथित शिष्य ही जातीय जनगणना की मांग कर रहे हैं। डॉक्टर भीमराव आंबेडकर भी जातिवाद के घोर विरोधी थे। जाति के खिलाफ दोनों नेताओं के समान मत थे।

सवाल है कि जाति आधारित जनगणना कराने और भाजपा के विरोध में मजबूत विपक्षी गठबंधन बनाने की इतनी चिंता प्रादेशिक पार्टियों को क्यों है? इसका कारण सीएसडीएस और लोक नीति द्वारा चुनावी आंकड़ों के विश्लेषण और सर्वेक्षण में है। इस अध्ययन का लब्बोलुआब यह है कि भाजपा ने प्रादेशिक पार्टियों के ओबीसी वोट बैंक में जबरदस्त सेंध लगाई है। नरेंद्र मोदी की कमान में भाजपा की पहली जीत यानी 2014 में ऐसा नहीं हुआ था। 2004 से 2014 के तीन चुनावों में प्रादेशिक पार्टियों का ओबीसी वोट शेयर 37 फीसदी के आसपास था। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में देश के 44 फीसदी ओबीसी मतदाताओं ने भाजपा को वोट दिया और प्रादेशिक पार्टियों की हिस्सेदारी सिमट कर 27 फीसदी पर आ गई। कांग्रेस को 15 फीसदी ओबीसी वोट मिले।

इन आंकड़ों ने प्रादेशिक पार्टियों की चिंता बढ़ाई है। हालांकि विधानसभा चुनाव में भाजपा के मुकाबले प्रादेशिक पार्टियों के पक्ष में ज्यादा ओबीसी वोट जाता है। जैसे बिहार में 2019 के लोकसभा चुनाव में राजद को सिर्फ 11 फीसदी ओबीसी वोट मिले, लेकिन 2020 के विधानसभा चुनाव में यह आंकड़ा 29 फीसदी पहुंच गया। तभी भारत के कुछ राजनेताओं को भ्रम है कि जातीय जनगणना से उन्हें नये वोट–बैंक मिल जाएंगे, भले ही देश हजारों जातियों का अखाड़ा बन जाए।

ध्यान रहे आखिरी बार 1931 में हुई जनगणना के लिहाज से देश में ओबीसी की आबादी 52 फीसदी के करीब है। लेकिन उसके बाद इतनी नई जातियों को ओबीसी में शामिल किया गया है कि इस संख्या में निश्चित रूप से इजाफा हुआ होगा। इसके बावजूद अगर यह आंकड़ा आता है कि 52 से 54 फीसदी आबादी ओबीसी है तो निश्चित रूप से आबादी के अनुपात में आरक्षण की मांग उठेगी।

प्रादेशिक पार्टियों को लग रहा है कि जाति जनगणना की मांग करा कर ओबीसी मतदाताओं को भाजपा से दूर किया जा सकता है और दूसरा तरीका यह है कि मजबूत विपक्षी गठबंधन बना कर यह मैसेज दिया जाए कि प्रादेशिक क्षत्रप भाजपा को हराने वाले हैं।
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