भारत में प्रजातंत्र के नाम पर राजा और सामंत शाही चलाते राजनीतिक दल !

हमारे जैसे देशों में जहां पर लंबी गुलामी के बाद स्वतंत्रता प्राप्त हुई उनमें अक्सर प्रजातंत्र के नाम पर राजाशाही अभी भी प्रयोग में है ! इसमें राजनीतिक दल अपने बाहुबलियों को पुराने समय के जागीरदारों के लट्ठेतो की तरह इस्तेमाल करके जनता को डरा धमका कर उनका वोट हासिल करके सत्ता प्राप्ति कर रहे हैं |

NewsBharati    20-Jan-2022 14:54:32 PM   
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हमारे देश में लंबे संघर्ष के बाद गुलामी से मुक्ति मिली और उसके बाद प्रजातंत्र की स्थापना हुई ! इसमें कल्पना की जा रही थी की जनता को उनकी स्वतंत्र इच्छा के अनुसार अपना नेता चुनने की आजादी होगी ! परंतु पुराने समय के राजा महाराजाओं की तरह-तरह के प्रलोभन और दबावों के द्वारा राजनीतिक दल सत्ता में आ रहे हैं जैसा कि राजाशाही में होता था ! आजकल देश के 5 राज्यों में चुनावों की प्रक्रिया चल रही है जिसको देखते हुए राजनीतिक दलों की तरह से मतदाताओं को लुभाने के लिए तरह-तरह के प्रलोभन उसी प्रकार दिए जा रहे हैं जैसे राजाशाही और सामंत शाही में राजा महाराजा जनता को कुछ खैरात दान में दिया करते थे ! जनता को लुभाने के लिए राजनीतिक दल उसी प्रकार से स्कूटर, मोबाइल फोन, लैपटॉप, स्मार्टफोन, बिजली और पानी के बिल में कटौती और नगद कैश देने की पेशकश जनता से उसी प्रकार करते हैं !
 
 

Voters 
 
देश का चुनाव आयोग इस प्रकार के वोटरों को लुभाने के लिए दिए गए प्रलोभनओ को रोकने में स्वयं को असमर्थ पा रहा है क्योंकि चुनाव प्रक्रिया में अभी तक इन पर लगाम लगाने का कोई प्रावधान नहीं है और ना ही कोई राजनीतिक दल सत्ता में आने के बाद इन पर लगाम लगाने का प्रयास करेगा ! यह पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट में भी पहुंच चुका है जहां पर एक जनहित याचिका में सुप्रीम कोर्ट से इस तरह के वादों पर लगाम लगाने की गुहार की गई थी क्योंकि यह वादे चुनावों की निष्पक्षता को प्रभावित कर रहे हैं ! परंतु कानून में इस तरह के वादों को भ्रष्ट आचरण न मानते हुए इन पर रोक लगाने में सुप्रीम कोर्ट ने मना कर दिया ! इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट इतना ही आदेश कर पाया की चुनाव आयोग राजनीतिक दलों से यह पूछे कि वह इन वादों को किस प्रकार पूरा करेंगे ! इसको देखते हुए 2013 के इस आदेश को पूरा करने के लिए चुनाव आयोग ने 2015 में सभी राजनीतिक दलों की बैठक बुलाई और उसमें मांग की की राजनीतिक दल अपने द्वारा इन वादों को पूरा करने का तरीका जनता को साफ-साफ बताएं ! परंतु इस बैठक में सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय को सभी दलों ने भारी विरोध के साथ मानने से इंकार कर दिया ! इसको देखते हुए पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त श्री ओ.पी रावत ने मांग की है कि देश की लोकसभा को इस प्रकार के वायदों को रोकने के लिए देश के कानून में बदलाव करना चाहिए क्योंकि तरह-तरह के प्रलोभन एक प्रकार से जनता की वोटों को खरीद रहे हैं !
 
सृष्टि के निर्माण और मानव जाति के उत्पन्न होने के समय से ही एक प्रकार का नियम बन गया की शक्तिशाली ही जनता पर राज करेगा ! आदि काल में इसे जंगल राज के नाम से पुकारा जाता था ! परंतु धीरे-धीरे समय के साथ राजाशाही अस्तित्व में आई जिसमे मानव के अधिकारों के हनन को देखते हुए राजनीतिक विचारकों ने प्रजातांत्रिक व्यवस्था की मांग की ! जिसमें समाज के हर व्यक्ति की स्वतंत्र इच्छा के अनुसार देश का शासक चुनने का प्रावधान हो ! परंतु हमारे जैसे देशों में जहां पर लंबी गुलामी के बाद स्वतंत्रता प्राप्त हुई उनमें अक्सर प्रजातंत्र के नाम पर राजाशाही अभी भी प्रयोग में है ! इसमें राजनीतिक दल अपने बाहुबलियों को पुराने समय के जागीरदारों के लट्ठेतो की तरह इस्तेमाल करके जनता को डरा धमका कर उनका वोट हासिल करके सत्ता प्राप्ति करते हैं ! इसके अतिरिक्त बाहर से दिखावा करने के लिए राजा के शाही कोष की तरह जनता के पैसे से ही गरीब तबके को तरह-तरह के आर्थिक प्रलोभन जैसे स्कूटर, लैपटॉप, स्मार्टफोन, बिजली पानी के बिल में कटौती और कैश देकर उनका वोट हासिल करते हैं !किस प्रकार जो धन देश के चौमुखी विकास पर खर्च होना चाहिए वह धन चुनावों में वोट खरीदने के लिए इस्तेमाल हो रहा है ! चुनाव के बाद इस तरह के प्रलोभन और दबाव के द्वारा सत्ता पर कब्जा करके स्वयं को शासक के रूप में स्थापित करके अपने लिए अकूत संपत्ति का भंडारण करते हैं ! !उदाहरण के रूप में सत्ताधारी राजनीतिज्ञों ने उत्तर प्रदेश में जगह जगह अपनी जागीरें स्थापित की हुई है जैसे दिल्ली की सीमा से लगे हुए नोएडा से लेकर आगरा तक तथा आगरा से लखनऊ तक इनकी अघोषित जागीरें हैं ! जिनमें इनकी तरह-तरह की रियलस्टेट तथा कारखाने स्थापित है ! इसी प्रकार से देश के अन्य हिस्सों में भी ऐसा ही माहौल है !आर्थिक प्रलोभनों के अलावा राजनीतिक दल जनता को सांप्रदायिकता, जातिवाद, क्षेत्रवाद इत्यादि के द्वारा बांटकर भी इनका वोट हासिल करते हैं !और सरेआम स्वयं को संप्रदाय विशेष के हितेषी दिखाने की कोशिश करते हैं ! क्या इससे समाज में विभाजन और विद्वेष नहीं फैल रहा है !
 
 
Vote divide 
 
 
अंग्रेजों की लंबी गुलामी के बाद भारत के संविधान निर्माताओं ने संविधान को गरीबों और पिछड़े देशवासियों को जिनको कानून की ज्यादा समझ नहीं थी उनकी सुविधा के लिए उदारवादी रूप दिया ! और इस उदारवादी व्यवस्था के लिए कानून में भी ऐसे प्रावधान किए गए जिसके द्वारा एक आरोपी को अपने को बेगुनाह सिद्ध करने का पूरा मौका और समय मिल सके ! परंतु इसका दुरुपयोग करते हुए हमारे देश के कानून व्यवस्था को चलाने वाले वकील और न्याय तंत्र इस व्यवस्था का इस्तेमाल इस प्रकार करते हैं जिससे न्याय होते होते काफी लंबा समय लगता है ! देशवासियों ने देखा है की प्रसिद्ध एलएन मिश्रा हत्याकांड जैसे राजनीतिक मुकदमों में न्याय मिलने में 20 साल से अधिक का समय लग जाता है ! इतने समय तक इन गंभीर अपराधों में आरोपित अपराधी अपने आप को बेगुनाह दिखाते हुए राजनीति में हिस्सा लेते हैं और देश की संसद और विधान मंडलों में पहुंच जाते हैं ! इसी प्रकार गंभीर अपराधों में नामित 495 सांसद और विधायक हैं जिन पर गंभीर अपराधों में मुकदमे चल रहे हैं ! अपनी राजनीतिक पहुंच के कारण यह पहले तो अपने मुकदमों को लंबा खींचते हैं और साथ में इनके विरुद्ध साक्ष्य देने वाले गवाहों को डरा धमका कर मुकदमा को अपने पक्ष में करवा लेते हैं ! जिससे ज्यादातर मामलों में पीड़ितों को न्याय ही नहीं मिलता है ! यह इस प्रकार अपना डर और दबदबा जनता में कायम करके उनका वोट प्राप्त कर लेते हैं ! इस प्रकार की न्याय व्यवस्था के कारण देश की राजनीति का अपराधीकरण भी हो रहा है और राजाशाही की वह धारणा पूरी हो रही है कि राजा को सात खून भी माफ है !
 
पश्चिमी देशों और अमेरिका में राजनीति का यह हाल नहीं है ! वहां पर कानून का व्यवहार हर स्तर के नागरिक के लिए एक जैसा है ! इसमें कानून अपराधी के रुतबे को नहीं देखता है यदि उसने अपराध किया है तो उसे शीघ्र अति शीघ्र सजा दी जाती है ! इसके उदाहरण है अभी कुछ समय पहले इंग्लैंड में वहां के राजकुमार एंडयूज का संबंध एक अमेरिका के शातिर अपराधी के साथ प्रकाश में आया था ! जिसके बाद सर्वप्रथम वहां की महारानी ने अपने पुत्र को राजकीय सारे पदों से हटाकर उनसे राजकुमार का सम्मान भी वापस ले लिया है ! इसी प्रकार इटली में कुछ समय पहले वहां के प्रधानमंत्री सिल्वियो जब टैक्स चोरी के अपराध में नामित हुए थे तो वहां की न्याय व्यवस्था ने उन्हें 7 साल का कठोर कारावास सुनाया था और इनका पूरा ट्रायल केवल 3 महीने में पूरा कर लिया गया था ! इसी संदर्भ में पूरे विश्व को पता है कि अमेरिका के राष्ट्रपति क्लिंटन का नाम जब लेवेंसिकी प्रकरण में आया था तब अमेरिका की लोकसभा ने उनके राष्ट्रपति रहते हुए ही उनके विरुद्ध भर्त्सना का प्रस्ताव पास किया था ! इसी प्रकार के अनेक उदाहरण पश्चिमी देशों मैं है क्या ऐसा हमारे देश में संभव है !
 

Laloo 
 
 
अभी कुछ समय पहले देश के भूतपूर्व मंत्री पी चिदंबरम के विरुद्ध बड़े-बड़े घोटाले और टैक्स चोरी के प्रकरण सामने आए थे जिन को देखते हुए उन्हें कुछ समय के लिए तिहाड़ जेल में रखा गया परंतु यह सब भी इसलिए हो सका क्योंकि वह सत्ता में नहीं थे अब उनके विरुद्ध अगले 20 साल तक मुकदमे चलते रहेंगे और धीरे-धीरे यह सब समाप्त हो जाएगा ! बिहार के भूतपूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसादयादव को लंबे इंतजार के बाद चारा घोटाला में 5 वर्ष का कारावास दिया गया परंतु इस कारावास के समय लालू प्रसाद जेल में एक विशेष व्यक्ति की तरह वहां पर मेहमान की तरह रहे ! इसमें एक माननीय की तरह उन्होंने अपना अधिकतम समय आरामदायक अस्पताल के कमरों या बेल पर अपने घर में ही बिताया ! इन शक्तिशाली राजनीतिज्ञों के साथ-साथ इनके बाहुबलियों को भी कानून की पकड़ से बचाने के लिए देश की न्याय व्यवस्था का दुरुपयोग सरेआम किया जा रहा है ! जिसके कारण इन बाहुबलियों को सजा तो मिलती नहीं इसके साथ ही अपने दबदबे से यह देश की विधानसभा और लोकसभा में प्रवेश कर जाते हैं ! जिसके बाद यह माननीय विधायक और सांसद बनकर कानून की पकड़ से और दूर चले जाते हैं !
 
अक्सर हमारे देशवासी जब पश्चिमी देशों में व्यवस्थित प्रजातंत्र को देखते हैं तो उन्हें अपने देश की उपरोक्त दशा याद करके बहुत ग्लानी का अनुभव होता है ! वे सोचते हैं कि हमारे देश में ऐसा प्रजातंत्र क्यों नहीं है ! तो अब सूचना के युग में उन्हें राजनीतिज्ञों का असली चेहरा पहचान कर अपने वोट का इस्तेमाल करना चाहिए ! इसके साथ साथ देश की कानून व्यवस्था को ठीक और आज के समय के अनुसार बनाने के लिए कानून के उन प्रावधानों पर विचार करना चाहिए जिनके कारण गंभीर अपराधों के मुकदमों में भी फैसला आने में लंबा समय लग जाता है ! इसके अतिरिक्त चुनाव प्रक्रिया में भी उचित बदलाव किए जाने चाहिए जिसके द्वारा गंभीर अपराधों में लिप्त अपराधी चुनाव में जीत कर देश की विधायकों में न पहुंच जाए ! इसके लिए देश की लोकसभा को ऐसे कानून पारित करने चाहिए जिससे चुनाव प्रक्रिया पश्चिमी देशों की तरह बने और अच्छे चरित्र और विचार के नागरिक ही देश की विधायिका में पहुंचकर देश के विकास और शासन तंत्र में उचित मार्गदर्शन कर सके ! इससे देशवासियों में राष्ट्रीयता की भावना और अपने देश की व्यवस्था में विश्वास जागृत होगा !

Shivdhan Singh

Service - Appointed as a commissioned officer in the Indian Army in 1971 and retired as a Colonel in 2008! Participated in the Sri Lankan and Kargil War. After retirement, he was appointed by Delhi High Court at the post of Special Metropolis Magistrate Class One till the age of 65 years. This post does not pay any remuneration and is considered as social service!

Independent journalism - Due to the influence of nationalist ideology from the time of college education, special attention was paid to national security! Hence after retirement, he started writing independent articles in Hindi press from 2010 in which the main focus is on national security of the country.