दलित-आदिवासियों काे लुभाने की काेशिश में ममता

NewsBharati    22-Sep-2020   
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ममता की निगाहें जंगल महल इलाके में अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के करीब 40 प्रतिशत वोटरों पर हैं. लोकसभा चुनावों में बीजेपी को इस इलाके में खासी कामयाबी मिली थी. ममता का मकसद वहां बीजेपी के वोट बैंक में सेंध लगाना है. अकेले बांकुड़ा जिले में ही विधानसभा की 12 सीटें हैं और जिले में एससी व एसटी की आबादी 38.5 प्रतिशत है. तृणमूल कांग्रेस के नेता कहते हैं, "अगर हमने बांकुड़ा जिले में आदिवासियो का भरोसा जीत लिया तो उसका असर पुरुलिया, पश्चिम मेदिनीपुर और झाड़ग्राम जिलों पर पड़ना तय है." इन इलाकों में विधानसभा की 32 सीटें हैं.
 
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसी सप्ताह पश्चिम बंगाल में देश की पहली दलित साहित्य अकादमी के गठन का एलान किया है . देश के कई राज्यों में दलित मुख्यमंत्री रहे हैं. लेकिन अब तक किसी राज्य में ऐसी किसी अकादमी का गठन नहीं किया गया था. हालांकि इसके राजनीतिक निहितार्थ हैं. दलित वोटों को पाने की रणनीति. लेकिन इतना जरूर है कि पश्चिम बंगाल ऐसी अकादमी बनाने वाला देश का पहला राज्या है. इससे पहले वे आदिवासी अकादमी के गठन का भी एलान कर चुकी हैं.
 
दलित लेखक मनोरंजन ब्यापारी को इस 14 सदस्यीय अकादमी का अध्यक्ष बनाया गया है. ममता का कहना हैं, "आदिवासियों, पिछड़ों और समाज के हाशिए पर रहने वाले लोगों की भाषा को बढ़ावा देना ही इस अकादमी के गठन का मकसद है. बांग्ला भाषा पर दलित भाषाओं का काफी असर है. अकादमी के सदस्यों में तमाम पिछड़े तबके के लोगों को प्रतिनिधित्व दिया गया है.”
 
मुख्यमंत्री की दलील है कि दलित साहित्य भी बांग्ला साहित्य का हिस्सा है. नई अकादमी के तहत दलित के अलावा आदिवासी, नमोशुद्र, डोम, बागदी, बाउरी और मांझी समेत अनुसूचित जनजाति में शामिल तमाम जातियों के साहित्य को बढ़ावा दिया जाएगा. इसके तहत एक लाइब्रेरी भी स्थापित की जाएगी. "मनोहर मुरली विश्वास जैसे दलित लेखक को पूरे देश में लोकप्रियता मिली है. लेकिन बंगाल में उनको उतनी मान्यता नहीं मिल सकी है. अकादमी के गठन का मकसद ऐसे लेखन और लेखकों को राज्य में भी पहचान दिलाना है.”
 
हालांकि तृणमूल कांग्रेस का रिकॉर्ड दलित शिक्षक और लेखकाें के प्रति बहुत साफ नहीं रहा है. पिछले साल कोलकाता स्थित रबींद्र भारतीय विश्वविद्यालय में अनुसूचित जाति (एससी) के चार प्रोफेसरों का कथित रूप से जाति के आधार पर अपमान किए जाने की घटना सामने आई थी, मामला तब और बढ़ गया था, जब इसके विरोध में विश्वविद्यालय के चार विभागों के प्रमुखों और तीन अध्यक्षों (डीन) ने अपने-अपने पदों से इस्तीफ़ा दे दिया था.
 
हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक कक्षा में अनुपस्थिति को लेकर (दलित) शिक्षकों की कुछ छात्रों के समूह से बहस हो गई थी. उसी दौरान उनका अपमान किया गया. विश्वविद्यालय के कई छात्र और स्टाफ इस घटना के लिए सतारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को जिम्मेदार ठहरा रहे थे . उनका कहना है कि टीएमसी की यूनियनों ने ही प्रोफेसरों का अपमान किया था.
 
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि ममता की निगाहें जंगल महल इलाके में अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के करीब 40 प्रतिशत वोटरों पर हैं. बीते लोकसभा चुनावों में बीजेपी को इस इलाके में खासी कामयाबी मिली थी. ममता का मकसद वहां बीजेपी के वोट बैंक में सेंध लगाना है. अकेले बांकुड़ा जिले में ही विधानसभा की 12 सीटें हैं और जिले में एससी व एसटी की आबादी 38.5 प्रतिशत है. झाड़ग्राम जिले में तृणमूल कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, "अगर हमने बांकुड़ा जिले में आदिवासियो का भरोसा जीत लिया तो उसका असर पुरुलिया, पश्चिम मेदिनीपुर और झाड़ग्राम जिलों पर पड़ना तय है." इन इलाकों में विधानसभा की 32 सीटें हैं.
 
सवाल उठ रहा है कि क्या ममता कि मंशा दलित साहित्य को सिर्फ मुख्यधारा में लाने की है. क्योंकि वे नौ साल से सत्ता में हैं और उन्हें पता है कि दलित साहित्य की क्या स्थिति है. इसलिए विपक्षी दलों के साथ-साथ तमाम लोग सवाल उठा रहे हैं. विपक्ष का कहना है कि अगले साल चुनाव होने हैं और इसे ध्यान में रख कर ही ऐसा किया गया है. अगर सरकार दलित साहित्य को बढ़ावा देने के प्रति सचमुच गंभीर है तो यह अच्छी बात है. लेकिन खतरा इस बात का है कि कहीं चुनावी वादों की तरह इसे भी भुला नहीं दिया जाए.”